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शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

अभी

आकुल व्याकुल
सुधि हीन
नहीं कल
प्यारे मोहन ,
अब तो आओ
बसी नयनों में छवि तेरी
प्रकाश बन
हृदय में समा जाओ ।
दूर कहीं
बजती वंशी तेरी
झंकार बन
कानों में समा जाओ ।
आकुल व्याकुल
नहीं कल ;
कल नहीं
आज नहीं
अभी
मेरे मन को
दिव्य बना जाओ ।
ओ मोहन न्यारे !!!

A digital abstract creation
- Anupam Gupta