कहाँ से निकलती है कविता
जितने गहरे से निकलती है कविता
उतने ही गहरे पैठ जाती है कविता
दिल की गहराइयों को छू लेती है कविता
मन की ऊंचाइयों को पा लेती है कविता
शायद अतीत की यादों से निकलती है कविता
या मन के किसी कोने में छुपी टीस से उपजती है कविता
या विषाद , दुःख - दर्द से द्रवित होकर बहती है कविता
यह जो मन में छिपा बैठा है अहंकार
उससे भी दर्पित हुई है कविता
नित नई नई खोजों , कुछ पाने के उछाह में उमंगित हुई है कविता
उछाह , हर्ष , उमंग , टीस , वेदना , ईर्ष्या , द्वेष
सभी में छिपी है कविता
शायद जीवन का रस है कविता
हाँ, जीवन का रस है कविता ।
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बुधवार, 25 नवंबर 2015
कविता
शुक्रवार, 21 अगस्त 2015
सम्पूर्ण
सांसें ही नहीं ;
पूरा जीवन हो तुम ।
धड़कन ही नहीं ;
पूरा जीवन हो तुम ।
यादें ही नहीं ;
पूरा जीवन हो तुम ।
कविता ही नहीं ;
पूरा जीवन हो तुम ।
केवल जीवन नहीं ;
सम्पूर्ण सत्य हो तुम ।।
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