हमारा अज्ञात वास और तप साधना का उद्देश्य
तप की शक्ति अपार है । जो कुछ अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न तत्त्व इस विश्व में है, उसका मूल “ताप” में ही सन्निहित है । सूर्य तपता है, इसलिए ही वह समस्त विश्व को जीवन प्रदान करने लायक प्राण भण्डार का अधिपति है । ग्रीष्म की ऊष्मा से जब वायु मण्डल भली प्रकार तप लेता है तो मंगलमयी वर्षा होती है । सोना तपता है तो खरा, तेजस्वी और मूल्यवान बनाता है । जितनी भी धातुएँ हैं, वे सभी खान से निकलते समय दूषित, मिश्रित व दुर्बल होती हैं, पर जब उन्हें कई बार भट्टियों में तपाया, पिघलाया और गलाया जाता है तो वे शुद्ध एवं मूल्यवान् बन जाती हैं । कच्ची मिट्टी के बने हुए कमजोर खिलौने और बर्तन जरा से आयात से टूट सकते हैं । तपाये और पकाये जाने पर मजबूत एवं रक्त वर्ण हो जाते हैं, कच्ची ईंट भट्टे में पकने पर पत्थर जैसी कड़ी हो जाती है । मामूली से कच्चे कंकड़ पकने पर चूना बनते हैं और उनके द्वारा बने हुए विशाल प्रसाद दीर्घकाल तक बने खड़े रहते हैं
मामूली-सा अभ्रक जब सौ बार अग्नि में तपाया जाता है तो चन्द्रोदय रस बनता है, अनेकों बार अग्नि संस्कार होने से ही धातुओं की मूल्यवान् भस्म रसायन बन जाती है और उनसे अशक्त एवं कष्ट साध्य रोगों से ग्रस्त रोगी पुनर्जीवन प्राप्त करते हैं । साधारण अन्न और दाल-सांग कच्चे रूप में न तो सुपाच्य होते हैं और न स्वादिष्ट । वे ही अग्नि संस्कार से पकाये जाने पर सुरुचिपूर्ण व्यंजनों का रूप धारण करते हैं । धोबी की भट्टी में चढ़ने पर मैले-कुचैले कपड़े निर्मल एवं स्वच्छ बन जाते हैं । पेट की जठराग्नि द्वारा पकाया हुआ अन्न भी रक्त, अस्थि का रूप धारण कर हमारे शरीर का भाग बनता है । यदि वह अग्नि संस्कार की-तप की प्रक्रिया बन्द हो जाय तो निश्चित रूप से विकास का सारा काम बन्द हो जायेगा।
प्रकृति तपती है, इसीलिए सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल
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