सुनसान के सहचर - २
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प्रकृति तपती है इसीलिए सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल रही है। जीव तपता है, उसी से उसके अन्तराल में छिपे हुए पुरुषार्थ पराक्रम, साहस, उल्लास, ज्ञान, विज्ञान,प्रकृति रत्नाकर श्रृंखला प्रस्फुटित होती है ।माता अपने अण्ड एवं भ्रूण को अपनी उदरस्थ ऊष्मा से पकाकर शिशु का प्रसव करती है । जिन जीवों ने मूर्छित स्थिति से ऊँचे उठने की, खाने-सोने से कुछ अधिक करने की आकांक्षा की है, उन्हें तप करना पड़ा है। संसार में अनेकों पुरुषार्थी-पराक्रमी इतिहास के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ने वाले महापुरुष जो हुए हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में अपने-अपने ढंग का तप करना पड़ा है । कृषक, विद्यार्थी, श्रमिक वैज्ञानिक, शासक, विद्वान्, उद्योग, कारीगर आदि सभी महत्त्वपूर्ण कार्य-भूमिकाओं का सम्पादन करने वाले व्यक्ति वे ही बन सके हैं, जिन्होंने कठोर श्रम, अध्यवसाय एवं तपश्चर्या की नीति को अपनाया है। यदि इन लोगों ने आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता, शिथिलता एवं विलासिता की नीति अपनाई होती तो वे कदापि उस स्थान पर न पहुँच पाते, जो उन्होंने कष्ट-सहिष्णु एवं पुरुषार्थ बनकर उपलब्ध किया है । पुरुषार्थों में आध्यात्मिक पुरुषार्थ का मूल्य और महत्व अधिक है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि सामान्य सम्पत्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा की महत्ता अधिक है । धन, बुद्धि, बल आदि के आधार पर अनेक व्यक्ति, उन्नतिशील, सुखी एवं सम्मानित बनते हैं; पर उन सबसे अनेक गुना महत्त्व वे लोग प्राप्त करते हैं, जिन्होंने आध्यात्मिक बल का संग्रह किया है। पीतल और सोने में, काँच और रत्न में जो अन्तर है, वही अन्तर सांसारिक सम्पत्ति एवं आध्यात्मिक सम्पदा के बीच में भी है। इस संसार में धनी, सेठ, अमीर, उमराव, गुणी, विद्वान् कलावन्त बहुत हैं, पर उनकी तुलना उन महान् आत्माओं के साथ नहीं हो सकती, जिनने
अपने आध्यात्मिक पुरुषार्थ के द्वारा अपना ही नहीं संसार का हित साधन
किया। प्राचीनकाल में भी सभी समझदार लोग अपने बच्चों को
कष्ट-सहिष्णु अध्यवसायी, तितीक्षाशील एवं तपसी बनाने के लिए छोटी
आयु में ही गुरुकुलों में भर्ती करते थे; ताकि आगे चलकर वे कठोर जीवनयापन करने के अभ्यस्त होकर महापुरुषों की महानता के अधिकारी बन सकें ।
- श्रीराम शर्मा आचार्य
क्रमशः
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