शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

तप साधना

सुनसान के सहचर ४
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नई सृष्टि रच डालने वाले विश्वामित्र की-रघुवंशी राजाओं की अनेक पीढ़ियों तक मार्गदर्शन करने वाले वशिष्ठ की क्षमता तथा साधना इसी में ही अन्तर्निहित थी । एक बार राजा विश्वामित्र वन में अपनी सेना को लेकर पहुँचे तो वशिष्ठ जी ने कुछ सामान न होने पर भी सारी सेना का समुचित आतिथ्य कर दिखाया तो विश्वामित्र दंग रह गये। किसी प्रसंग को लेकर जब निहत्थे वशिष्ठ और विशाल सेना सम्पन्न विश्वामित्र में युद्ध ठन गया, तो तपस्वी वशिष्ठ के सामने राजा विश्वामित्र को परास्त ही होना पड़ा। उन्होंने “धिक् बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्म तेजो बलम्" की घोषणा करते हुए राजपाट छोड़ दिया और सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति की तपश्चर्या के लिए शेष जीवन समर्पित कर दिया।

अपने नरकगामी पूर्व पुरुषों का उद्धार तथा प्यासी पृथ्वी को जलपूर्ण करके जन-समाज का कल्याण करने के लिए गंगावतरण की आवश्यकता थी। इस महान् उद्देश्य की पूर्ति लौकिक पुरुषार्थ से नहीं वरन् तप शक्ति से ही सम्भव थी। भगीरथ कठोर तप करने के लिए वन को गए और अपनी साधना से प्रभावित कर गंगाजी को भूलोक में लाने एवं शिवजी को अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार किया, यह कार्य साधारण प्रक्रिया से सम्पन्न न होता, तप ने ही उन्हें सम्भव बनाया।

च्यवन ऋषि इतना कठोर दीर्घकालीन तप कर रहे थे कि उनके सारे

शरीर पर दीमक ने अपना घर बना लिया था और उनका शरीर एक मिट्टी का टीला जैसा बन गया था । राजकुमारी सुकन्या को छेदों में दो चमकदार चीजें दीखी और उनमें काँटे चुभो दिए । यह चमकदार चीजें और कुछ नहीं च्यवन ऋषि की आँखें थी । च्यवन ऋषि को इतनी कठोर तपस्या इसलिए करनी पड़ी कि वे अपनी अन्तरात्मा में सन्निहित शक्ति केन्द्रो को जागृत करके परमात्मा के अक्षय शक्ति भण्डार में भागीदारी मिलने की अपनी योग्यता सिद्ध कर सकें ।
- श्रीराम शर्मा आचार्य
क्रमशः
#WeAreGayatriPariwar,
#गर्व_से_कहें_हम_गायत्री_परिवार_हैं,
#awgp,
#muchchhu,

तपश्चर्या

सुनसान के सहचर ३
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संसार में जब कभी कोई महान् कार्य सम्पन्न हुए हैं, तो उनके पीछे तपश्चर्या की शक्ति अवश्य रही है । हमारा देश देवताओं और नर-रत्नों का देश रहा है । यह भारत भूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती रही है। ज्ञान, पराक्रम और सम्पदा की दृष्टि से महाराष्ट्र सदा से विश्व का मुकुटमणि रहा है । उन्नति के इस उच्च शिखर पर पहुँचने का कारण यहाँ के निवासियों की प्रचण्ड तपनिष्ठा ही रही है । आलसी और विलासी, स्वार्थी और लोभी लोगों को यहाँ सदा घृणित एवं निकृष्ट माना जाता रहा है। तप शक्ति की महत्ता को यहाँ के निवासियों ने पहचाना, तत्त्वत: कार्य किया और उसके उपार्जन में पूरी तत्परता दिखाई, तभी यह सम्भव हो सका कि भारत को जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं सम्पदाओं के स्वामी होने का इतना ऊँचा गौरव प्राप्त हुआ ।

पिछले इतिहास पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत का बहुमुखी विकास तपश्चर्या पर आधारित एवं अवलम्बित होता है । सृष्टि के उत्पन्न कीर्ति प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण के पूर्व, विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल पुष्प पर अवस्थित होकर, सौ वर्षों तक गायत्री उपासना के आधार पर तप किया, तभी उन्हें सृष्टि निर्माण एवं ज्ञान-विज्ञान के उत्पादन की शक्ति उपलब्ध हुई । मानव धर्म के आविष्कर्ता भगवान मनु ने अपनी रानी शतरूपा के साथ प्रचण्ड तप करने के पश्चात् ही अपना महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्वपूर्ण किया था, भगवान् शंकर स्वयं तप रूप हैं । उनका कार्यक्रम सदा से तप साधना ही रहा। शेषजी तप के बल पर ही इस पृथ्वी को अपने शीश पर धारण किये हैं । सप्त ऋषियों ने इसी मार्ग पर दीर्घकाल तक चलते रहकर वह सिद्धि प्राप्त की, जिससे सदा उनका नाम अजर-अमर रहेगा । देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्राचार्य अपने-अपने शिष्यों के कल्याण, मार्गदर्शन और सफलता की साधना अपनी तप शक्ति के आधार पर ही करते रहे हैं ।
- श्रीराम शर्मा आचार्य
क्रमशः
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तप

सुनसान के सहचर - २
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प्रकृति तपती है इसीलिए सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल रही है। जीव तपता है, उसी से उसके अन्तराल में छिपे हुए पुरुषार्थ पराक्रम, साहस, उल्लास, ज्ञान, विज्ञान,प्रकृति रत्नाकर श्रृंखला प्रस्फुटित होती है ।माता अपने अण्ड एवं भ्रूण को अपनी उदरस्थ ऊष्मा से पकाकर शिशु का प्रसव करती है । जिन जीवों ने मूर्छित स्थिति से ऊँचे उठने की, खाने-सोने से कुछ अधिक करने की आकांक्षा की है, उन्हें तप करना पड़ा है। संसार में अनेकों पुरुषार्थी-पराक्रमी इतिहास के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ने वाले महापुरुष जो हुए हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में अपने-अपने ढंग का तप करना पड़ा है । कृषक, विद्यार्थी, श्रमिक वैज्ञानिक, शासक, विद्वान्, उद्योग, कारीगर आदि सभी महत्त्वपूर्ण कार्य-भूमिकाओं का सम्पादन करने वाले व्यक्ति वे ही बन सके हैं, जिन्होंने कठोर श्रम, अध्यवसाय एवं तपश्चर्या की नीति को अपनाया है। यदि इन लोगों ने आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता, शिथिलता एवं विलासिता की नीति अपनाई होती तो वे कदापि उस स्थान पर न पहुँच पाते, जो उन्होंने कष्ट-सहिष्णु एवं पुरुषार्थ बनकर उपलब्ध किया है । पुरुषार्थों में आध्यात्मिक पुरुषार्थ का मूल्य और महत्व अधिक है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि सामान्य सम्पत्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा की महत्ता अधिक है । धन, बुद्धि, बल आदि के आधार पर अनेक व्यक्ति, उन्नतिशील, सुखी एवं सम्मानित बनते हैं; पर उन सबसे अनेक गुना महत्त्व वे लोग प्राप्त करते हैं, जिन्होंने आध्यात्मिक बल का संग्रह किया है। पीतल और सोने में, काँच और रत्न में जो अन्तर है, वही अन्तर सांसारिक सम्पत्ति एवं आध्यात्मिक सम्पदा के बीच में भी है। इस संसार में धनी, सेठ, अमीर, उमराव, गुणी, विद्वान् कलावन्त बहुत हैं, पर उनकी तुलना उन महान् आत्माओं के साथ नहीं हो सकती, जिनने

अपने आध्यात्मिक पुरुषार्थ के द्वारा अपना ही नहीं संसार का हित साधन

किया। प्राचीनकाल में भी सभी समझदार लोग अपने बच्चों को

कष्ट-सहिष्णु अध्यवसायी, तितीक्षाशील एवं तपसी बनाने के लिए छोटी

आयु में ही गुरुकुलों में भर्ती करते थे; ताकि आगे चलकर वे कठोर जीवनयापन करने के अभ्यस्त होकर महापुरुषों की महानता के अधिकारी बन सकें ।
- श्रीराम शर्मा आचार्य
क्रमशः
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गुरुवार, 27 अगस्त 2020

हमारा अज्ञातवास

सुनसान के सहचर

हमारा अज्ञात वास और तप साधना का उद्देश्य

तप की शक्ति अपार है । जो कुछ अधिक से अधिक शक्ति सम्पन्न तत्त्व इस विश्व में है, उसका मूल “ताप” में ही सन्निहित है । सूर्य तपता है, इसलिए ही वह समस्त विश्व को जीवन प्रदान करने लायक प्राण भण्डार का अधिपति है । ग्रीष्म की ऊष्मा से जब वायु मण्डल भली प्रकार तप लेता है तो मंगलमयी वर्षा होती है । सोना तपता है तो खरा, तेजस्वी और मूल्यवान बनाता है । जितनी भी धातुएँ हैं, वे सभी खान से निकलते समय दूषित, मिश्रित व दुर्बल होती हैं, पर जब उन्हें कई बार भट्टियों में तपाया, पिघलाया और गलाया जाता है तो वे शुद्ध एवं मूल्यवान् बन जाती हैं । कच्ची मिट्टी के बने हुए कमजोर खिलौने और बर्तन जरा से आयात से टूट सकते हैं । तपाये और पकाये जाने पर मजबूत एवं रक्त वर्ण हो जाते हैं, कच्ची ईंट भट्टे में पकने पर पत्थर जैसी कड़ी हो जाती है । मामूली से कच्चे कंकड़ पकने पर चूना बनते हैं और उनके द्वारा बने हुए विशाल प्रसाद दीर्घकाल तक बने खड़े रहते हैं

मामूली-सा अभ्रक जब सौ बार अग्नि में तपाया जाता है तो चन्द्रोदय रस बनता है, अनेकों बार अग्नि संस्कार होने से ही धातुओं की मूल्यवान् भस्म रसायन बन जाती है और उनसे अशक्त एवं कष्ट साध्य रोगों से ग्रस्त रोगी पुनर्जीवन प्राप्त करते हैं । साधारण अन्न और दाल-सांग कच्चे रूप में न तो सुपाच्य होते हैं और न स्वादिष्ट । वे ही अग्नि संस्कार से पकाये जाने पर सुरुचिपूर्ण व्यंजनों का रूप धारण करते हैं । धोबी की भट्टी में चढ़ने पर मैले-कुचैले कपड़े निर्मल एवं स्वच्छ बन जाते हैं । पेट की जठराग्नि द्वारा पकाया हुआ अन्न भी रक्त, अस्थि का रूप धारण कर हमारे शरीर का भाग बनता है । यदि वह अग्नि संस्कार की-तप की प्रक्रिया बन्द हो जाय तो निश्चित रूप से विकास का सारा काम बन्द हो जायेगा।

प्रकृति तपती है, इसीलिए सृष्टि की सारी संचालन व्यवस्था चल



बुधवार, 26 अगस्त 2020

सुनसान के सहचर

विषय सूची

१-हमारा अज्ञातवास और तप साधना का उद्देश्य

२-हिमालय में प्रवेश

३-प्रकृति का रुद्राभिषेक

४-सुनसान की झोपड़ी

५-सुनसान के सहचर

६-विश्व समाज की सदस्यता

७-हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू
 ८-हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

***
पुस्तक परिचय

इसे एक सौभाग्य, संयोग ही कहना चाहिए कि जीवन को आरम्भ से अन्त तक एक समर्थ सिद्ध पुरुष के संरक्षण में गतिशील रहने का अवसर मिल गया । उस मार्गदर्शक ने जो भी आदेश दिए वे ऐसे थे जिनमें इस अकिंचन जीवन की सफलता के साथ-साथ लोक-मंगल का महान् प्रयोजन भी जुड़ा है । १५ वर्ष की आयु से उनकी अप्रत्याशित अनुकम्पा बरसनी शुरू हुई । इधर से भी यह प्रयल हुए कि महान् गुरु के गौरव के अनुरूप शिष्य बना जाए। सो एक प्रकार से उस सत्ता के सामने आत्म समर्पण ही हो गया । कठपुतली की तरह अपनी समस्त शारीरिक और भावनात्मक क्षमताएँ उन्हीं के चरणों पर समर्पित हो गयीं। जो आदेश हुआ उसे पूरी श्रद्धा के साथ शिरोधार्य कर कार्यान्वित किया गया । अपना यही क्रम अब तक चलता रहा है । अपने अद्यावधि क्रिया-कलापों को एक

कठपुतली की उछल-कूद कहा जाय तो उचित ही विशेषण होगा।

पन्द्रह वर्ष समाप्त होने और सोलहवें में प्रवेश करते समय यह दिव्य साक्षात्कार मिलन हुआ । उसे ही विलय कहा जा सकता है । आरम्भ में २४ वर्ष तक जौ की रोटी और छाछ इन दो पदार्थों के आधार पर अखण्ड दीपक के समीप २४ गायत्री महापुरश्चरण करने की आज्ञा हुई । सो ठीक प्रकार सम्पन्न हुए। उसके बाद दस वर्ष तक धार्मिक चेतना उत्पन्न करने के लिए प्रचार,संगठन,लेखन,भाषण एवं रचनात्मक कार्यों की श्रृंखला चली। ४ हजार शाखाओं वाला गायत्री परिवार बनकर खड़ा हो गया। उन वर्षों में एक ऐसा संघ बनकर खड़ा हो गया, जिसे नवनिर्माण के लिए उपयुक्त आधारशिला कहा जा सके । चौबीस वर्ष की पुरश्चरण साधना का व्यय दस वर्ष में हो गया। अधिक ऊँची जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए नई शक्ति की आवश्यकता पड़ी । सो इसके लिए फिर आदेश हुआ कि इस शरीर को एक वर्ष तक हिमालय के उन दिव्य स्थानों में रहकर विशिष्ट साधना करनी चाहिए जहाँ अभी भी आत्म चेतना का शक्ति प्रवाह प्रवाहित होता है । अन्य आदेशों की तरह यह आदेश भी शिरोधार्य ही हो सकता था।
सन् ५८ में एक वर्ष के लिए हिमालय तपश्चर्या के लिए प्रयाण हुआ। गंगोत्री में भगीरथ के तप-स्थान पर और उत्तरकाशी में परशुराम के तप-स्थान पर यह एक वर्ष की साधना सम्पन्न हुई । भगीरथ की तपस्या गंगा-अवतरण को और परशुराम की तपस्या दिग्विजय में परशु प्रस्तुत कर सकी थी । नव निर्माण के महान् प्रयोजन में अपनी तपस्या के कुछ श्रद्धा बिन्दु काम आ सके तो उसे भी साधना की सफलता ही कहा जा सकेगा।

उस एक वर्षीय तप साधना के लिए गंगोत्री जाते समय मार्ग में अनेक विचार उठते रहे । जहाँ-जहाँ रहना हुआ, वहाँ-वहाँ भी अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार मन में भाव भरी हिलोरें उठती रहीं । लिखने का व्यसन रहने से उन प्रिय अनुभूतियों को लिखा भी जाता रहा। उनमें से कुछ ऐसी थीं,जिनका रसास्वादन दूसरे करें तो लाभ उठाएँ । उन्हें अखण्ड-ज्योति में छपने भेज दिया गया,छप भी गयीं । अनेक ऐसी थीं जिन्हें प्रकट करना अपने जीवनकाल में उपयुक्त नहीं समझा गया सो नहीं छपाई गयीं । 

उन दिनों “साधक की डायरी के पृष्ठ” “सुनसान के सहचर” आदि शीर्षकों से जो लेख “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका में छपे,वे लोगों को बहुत रुचे । बात पुरानी हो गई पर अभी लोग उन्हें पढ़ने के लिए उत्सुक थे। सो इन लेखों को पुस्तकाकार में प्रकाशित कर देना उचित समझा गया। अस्तु यह पुस्तक प्रस्तुत है । घटनाक्रम अवश्य पुराना हो गया, पर उन दिनों जो विचार अनुभूतियाँ उठतीं,वे शाश्वत हैं । उनकी उपयोगिता में समय के पीछे पड़ जाने के कारण कुछ अन्तर नहीं आया है आशा की जानी चाहिए भावनाशील अन्तःकरणों को वे अनुभूतियाँ अभी भी हमारी ही तरह स्पंदित कर सकेंगी और पुस्तक की उपयोगिता एवं सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।
एक विशेष लेख इसी संकलन में और है वह है-" हिमालय के हृदय का। विवेचन-विश्लेषण ।" बद्रीनारायण से लेकर गंगोत्री के बीच का लगभग ४०० मील परिधि का वह स्थान है, जो प्रायः सभी देवताओं और ऋषियों का तप केन्द्र रहा है । इसे ही धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है । स्वर्ग कथाओं के जो घटनाक्रम एवं व्यक्ति चरित्र जुड़े हैं, उनकी यदि इतिहास-भूगोल से संगति मिलाई जाये तो वे धरती पर ही सिद्ध होते हैं और उस बात में बहुत वजन मालूम पड़ता है, जिसमें कि इन्द्र शासन एवं आर्ष-सभ्यता की संस्कृति का उद्गम स्थान हिमालय का उपरोक्त स्थान बताया गया है । अब वहाँ बर्फ बहुत पड़ने लगी है । ऋतु परिस्थितियों की श्रृंखला में अब वह हिमालय का हृदय असली उत्तराखण्ड इस योग्य नहीं रहा कि वहाँ आज के दुर्बल शरीरों वाला व्यक्ति निवास-स्थान बना सके । इसलिए आधुनिक उत्तराखण्ड नीचे चला गया और हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण, गंगोत्री, गोमुख तक ही उसकी परिधि सीमित हो गयी है ।

"हिमालय के हृदय” क्षेत्र में जहाँ प्राचीन स्वर्ग की विशेषता विद्यमान है, वहाँ तपस्याओं से प्रभावित शक्तिशाली आध्यात्मिक क्षेत्र भी विद्यमान है । हमारे मार्गदर्शक वहाँ रहकर प्राचीनतम ऋषियों की इस तप संस्कारित भूमि से अनुपम शक्ति प्राप्त करते हैं । कुछ समय के लिए हमें भी उस स्थान पर रहने का सौभाग्य मिला और वे दिव्य स्थान अपने भी देखने में आये । सो इनका जितना दर्शन हो सका,उसका वर्णन अखण्ड ज्योति में प्रस्तुत किया गया था। वह लेख भी अपने ढंग का अनोखा है । उससे संसार में एक ऐसे स्थान का पता चलता है, जिसे आत्म-शक्ति का ध्रुव कहा जा सकता है । धरती के उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुवों में विशेष शक्तियाँ हैं । अध्यात्म शक्ति का एक ध्रुव हमारी समझ में आया हैं। जिसमें अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ भरी पड़ी हैं । सूक्ष्म शक्तियों की दृष्टि से भी और शरीरधारी सिद्ध पुरुषों की दृष्टि से भी ।
इस दिव्य केन्द्र की ओर लोगों का ध्यान बना रहे, इस दृष्टि से उसका परिचय से तो रहना ही चाहिए, इस दृष्टि उस जानकारी को मूल्यवान ही कहा जा सकता है । ब्रह्मवर्चस,शांतिकुंज,गायत्री नगर का निर्माण उत्तराखण्ड के द्वार में करने का उद्देश्य यही रहा है । जो लोग यहाँ आते हैं, उनने असीम शान्ति प्राप्ति की है । भविष्य में उसका महत्त्व असाधारण होने जा रहा है। उन सम्भावनाओं को व्यक्त तो नहीं किया जा रहा है । अगले दिनों उनसे लोग चमत्कृत हुए बिना न रहेंगे ।

श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 11 मई 2020

दिन अट्ठारह

महाभारत युद्ध के
18 दिनों का रहस्य💐

माना जाता है कि महाभारत युद्ध में
एकमात्र जीवित बचा कौरव युयुत्सु
था और 24,165 कौरव
सैनिक लापता हो गए थे।

लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य
हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की
ओर से लड़े थे। 
 
शोधानुसार जब महाभारत का युद्ध हुआ,
तब श्रीकृष्ण की आयु 83 वर्ष थी।

महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद उन्होंने देह
त्याग दी थी।

इसका मतलब 119 वर्ष की आयु में
उन्होंने देहत्याग किया था।

भगवान श्रीकृष्ण द्वापर के अंत और
कलियुग के आरंभ के संधि काल में
विद्यमान थे।

भागवत पुराण ने अनुसार श्रीकृष्‍ण
के देह छोड़ने के बाद 3102 ईसा

पूर्व कलिकाल का प्रारंभ हुआ था।

इस प्रकार कलियुग को आरंभ
हुए 5120 वर्ष हो गए हैं।

महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने अपनी
सेना का पड़ाव कुरुक्षेत्र के पश्चिमी क्षेत्र
में सरस्वती नदी के दक्षिणी तट पर बसे
समंत्र पंचक तीर्थ के पास हिरण्यवती
नदी (सरस्वती नदी की सहायक नदी)
के तट पर डाला।

कौरवों ने कुरुक्षेत्र के पूर्वी भाग में वहां
से कुछ योजन की दूरी पर एक समतल
मैदान में अपना पड़ाव डाला।
 
दोनों ओर के शिविरों में सैनिकों के
भोजन और घायलों के इलाज की
उत्तम व्यवस्था थी।

हाथी,घोड़े और रथों की
अलग व्यवस्था थी।

हजारों शिविरों में से प्रत्येक शिविर में
प्रचुर मात्रा में खाद्य सामग्री,अस्त्र-शस्त्र,
यंत्र और कई वैद्य और शिल्पी
वेतन देकर रखे गए।
 
दोनों सेनाओं के बीच में युद्ध के लिए
5 योजन(1 योजन= 8 किमी की परिधि,
विष्णु पुराण के अनुसार 4 कोस या कोश
= 1 योजन= 13 किमी से 16 किमी)
=40 किमी का घेरा छोड़ दिया गया था।

कौरवों की ओर थे सहयोगी जनपद:-
गांधार,मद्र,सिन्ध,काम्बोज,कलिंग,सिंहल,
दरद,अभीषह,मागध,पिशाच,कोसल,
प्रतीच्य,बाह्लिक,उदीच्य,अंश,पल्लव,
सौराष्ट्र,अवन्ति,निषाद,शूरसेन,शिबि,
वसति,पौरव,तुषार,चूचुपदेश,अशवक,
पाण्डय,पुलिन्द,पारद,क्षुद्रक,प्राग्ज्योतिषपुर,
मेकल,कुरुविन्द,त्रिपुरा,शल,अम्बष्ठ,कैतव,
यवन,त्रिगर्त,सौविर और प्राच्य।
 
कौरवों की ओर से ये यौद्धा लड़े थे :
भीष्म,द्रोणाचार्य,कृपाचार्य,कर्ण,अश्वत्थामा,
मद्रनरेश शल्य,भूरिश्र्वा,अलम्बुष,कृतवर्मा,
कलिंगराज,श्रुतायुध,शकुनि,भगदत्त,जयद्रथ, 
विन्द-अनुविन्द,काम्बोजराज,सुदक्षिण,बृहद्वल,
दुर्योधन व उसके 99 भाई
सहित अन्य हजारों यौद्धा।
 
पांडवों की ओर थे ये जनपद :
पांचाल,चेदि,काशी,करुष,मत्स्य,केकय,सृंजय,
दक्षार्ण,सोमक,कुन्ति,आनप्त,दाशेरक,प्रभद्रक,
अनूपक,किरात,पटच्चर,तित्तिर,चोल,पाण्ड्य,
अग्निवेश्य,हुण्ड,दानभारि,शबर,उद्भस,वत्स,
पौण्ड्र,पिशाच,पुण्ड्र,कुण्डीविष,मारुत,धेनुक,
तगंण और परतगंण।
 
पांडवों की ओर से लड़े थे ये यौद्धा :
भीम,नकुल,सहदेव,अर्जुन,युधिष्टर,द्रौपदी
के पांचों पुत्र,सात्यकि,उत्तमौजा,विराट,द्रुपद,
धृष्टद्युम्न,अभिमन्यु,पाण्ड्यराज,घटोत्कच,
शिखण्डी,युयुत्सु,कुन्तिभोज,उत्तमौजा,
शैब्य और अनूपराज नील।
 
तटस्थ जनपद :
विदर्भ,शाल्व,चीन,लौहित्य,शोणित,नेपा,
कोंकण,कर्नाटक,केरल,आन्ध्र,द्रविड़ आदि
ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया।

पितामह भीष्म की सलाह पर दोनों दलों
ने एकत्र होकर युद्ध के कुछ नियम बनाए।

उनके बनाए हुए नियम निम्नलिखित हैं-
 
1. प्रतिदिन युद्ध सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त
तक ही रहेगा।
सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं होगा।

2. युद्ध समाप्ति के पश्‍चात छल-कपट
छोड़कर सभी लोग प्रेम का व्यवहार करेंगे।

3. रथी रथी से,हाथी वाला हाथी वाले से
और पैदल पैदल से ही युद्ध करेगा।

4. एक वीर के साथ एक ही वीर युद्ध करेगा।

5. भय से भागते हुए या शरण में आए हुए
लोगों पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार नहीं किया
जाएगा।

6. जो वीर निहत्था हो जाएगा उस पर
कोई अस्त्र नहीं उठाया जाएगा।

7. युद्ध में सेवक का काम करने वालों पर
कोई अस्त्र नहीं उठाएगा।

प्रथम दिन का युद्ध :

प्रथम दिन एक ओर जहां कृष्ण-अर्जुन
अपने रथ के साथ दोनों ओर की सेनाओं
के मध्य खड़े थे और अर्जुन को गीता का
उपदेश दे रहे थे।

इसी दौरान भीष्म पितामह ने सभी योद्धाओं
को कहा कि अब युद्ध शुरू होने वाला है।

इस समय जो भी योद्धा अपना खेमा
बदलना चाहे वह स्वतंत्र है कि वह जिसकी
तरफ से भी चाहे युद्ध करे।

इस घोषणा के बाद धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु
डंका बजाते हुए कौरव दल को छोड़ पांडवों
के खेमे में चले गया।

ऐसा युधिष्ठिर के क्रियाकलापों
के कारण संभव हुआ था।

श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद अर्जुन ने देवदत्त
नामक शंख बजाकर युद्ध की घोषणा की।
 
इस दिन 10 हजार सैनिकों की मृत्यु हुई।
भीम ने दु:शासन पर आक्रमण किया।
अभिमन्यु ने भीष्म का धनुष तथा रथ
का ध्वजदंड काट दिया।

पहले दिन की समाप्ति पर पांडव पक्ष को
भारी नुकसान उठाना पड़ा।

विराट नरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत क्रमशः
शल्य और भीष्म के द्वारा मारे गए।

भीष्म द्वारा उनके कई सैनिकों
का वध कर दिया गया।
 
कौन मजबूत रहा :
पहला दिन पांडव पक्ष को नुकसान
उठाना पड़ा और कौरव पक्ष मजबूत रहा।
 
दूसरे दिन का युद्ध :

कृष्ण के उपदेश के बाद अर्जुन तथा भीष्म,
धृष्टद्युम्न तथा द्रोण के मध्य युद्ध हुआ।
सात्यकि ने भीष्म के सारथी को घायल
कर दिया।
 
द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को कई बार हराया
और उसके कई धनुष काट दिए,भीष्म द्वारा
अर्जुन और श्रीकृष्ण को कई बार घायल
किया गया।

इस दिन भीम का कलिंगों और निषादों
से युद्ध हुआ तथा भीम द्वारा सहस्रों कलिंग
और निषाद मार गिराए गए,अर्जुन ने भी
भीष्म को भीषण संहार मचाने से रोके रखा।

कौरवों की ओर से लड़ने वाले कलिंगराज
भानुमान, केतुमान,अन्य कलिंग वीर योद्धा
मारे गए।
 
कौन मजबूत रहा :
दूसरे दिन कौरवों को नुकसान उठाना पड़ा
और पांडव पक्ष मजबूत रहा।

तीसरा दिन :
कौरवों ने गरूड़ तथा पांडवों ने अर्धचंद्राकार
जैसी सैन्य व्यूह रचना की।
कौरवों की ओर से दुर्योधन तथा पांडवों की
ओर से भीम व अर्जुन सुरक्षा कर रहे थे।

इस दिन भीम ने घटोत्कच के साथ मिलकर
दुर्योधन की सेना को युद्ध से भगा दिया।
यह देखकर भीष्म भीषण संहार मचा देते हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन को भीष्म वध करने को
कहते हैं,परंतु अर्जुन उत्साह से युद्ध नहीं
कर पाता जिससे श्रीकृष्ण स्वयं भीष्म को
मारने के लिए उद्यत हो जाते हैं,परंतु अर्जुन
उन्हें प्रतिज्ञारूपी आश्वासन देकर कौरव
सेना का भीषण संहार करते हैं।

वे एक दिन में ही समस्त प्राच्य,सौवीर,
क्षुद्रक और मालव क्षत्रियगणों को मार
गिराते हैं। 
 
भीम के बाण से दुर्योधन अचेत हो गया और
तभी उसका सारथी रथ को भगा ले गया।

भीम ने सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया।

इस दिन भी कौरवों को ही अधिक क्षति
उठाना पड़ती है।

उनके प्राच्य,सौवीर,क्षुद्रक और मालव
वीर योद्धा मारे जाते हैं।
 
कौन मजबूत रहा :
इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।
 
चौथा दिन :
चौथे दिन भी कौरव पक्ष को
भारी नुकसान हुआ।
इस दिन कौरवों ने अर्जुन को अपने बाणों
से ढंक दिया,परंतु अर्जुन ने सभी को मार
भगाया।

भीम ने तो इस दिन कौरव सेना में हाहाकार
मचा दी,दुर्योधन ने अपनी गज सेना भीम को
मारने के लिए भेजी,परंतु घटोत्कच की
सहायता से भीम ने उन सबका नाश कर
दिया और 14 कौरवों को भी मार गिराया,
परंतु राजा भगदत्त द्वारा जल्द ही भीम पर
नियंत्रण पा लिया गया।

बाद में भीष्म को भी अर्जुन और भीम
ने भयंकर युद्ध कर कड़ी चुनौती दी।
 
कौन मजबूत रहा :

इस दिन कौरवों को नुकसान उठाना पड़ा
और पांडव पक्ष मजबूत रहा।
 
पांचवें दिन का युद्ध :
श्रीकृष्ण के उपदेश के बाद युद्ध
की शुरुआत हुई और फिर भयंकर
मार-काट मची।

दोनों ही पक्षों के सैनिकों का
भारी संख्या में वध हुआ।

इस दिन भीष्म ने पांडव सेना को अपने
बाणों से ढंक दिया। उन पर रोक लगाने
के लिए क्रमशः अर्जुन और भीम ने उनसे
भयंकर युद्ध किया।

सात्यकि ने द्रोणाचार्य को भीषण संहार
करने से रोके रखा।

भीष्म द्वारा सात्यकि को युद्ध क्षेत्र
से भगा दिया गया।
सात्यकि के 10 पुत्र मारे गए। 
 
कौन मजबूत रहा :
इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।
 
छठे दिन का युद्ध :
कौरवों ने क्रोंचव्यूह तथा पांडवों ने मकरव्यूह
के आकार की सेना कुरुक्षे‍त्र में उतारी।

भयंकर युद्ध के बाद द्रोण का
सारथी मारा गया।
युद्ध में बार-बार अपनी हार से दुर्योधन
क्रोधित होता रहा,परंतु भीष्म उसे ढांढस
बंधाते रहे।
अंत में भीष्म द्वारा पांचाल सेना का
भयंकर संहार किया गया।
 
कौन मजबूत रहा :
इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।

सातवें दिन का युद्ध :
सातवें दिन कौरवों द्वारा मंडलाकार व्यूह
की रचना और पांडवों ने वज्र व्यूह की
आकृति में सेना लगाई।

मंडलाकार में एक हाथी के पास सात रथ,
एक रथ की रक्षार्थ सात अश्‍वारोही,एक
अश्‍वारोही की रक्षार्थ सात धनुर्धर तथा
एक धनुर्धर की रक्षार्थ दस
सैनिक लगाए गए थे।

सेना के मध्य दुर्योधन था। वज्राकार में
दसों मोर्चों पर घमासान युद्ध हुआ।
 
इस दिन अर्जुन अपनी युक्ति से कौरव
सेना में भगदड़ मचा देता है।
धृष्टद्युम्न दुर्योधन को युद्ध में हरा देता है।
अर्जुन पुत्र इरावान द्वारा विन्द और अनुविन्द
को हरा दिया जाता है,भगदत्त घटोत्कच को
और नकुल सहदेव मिलकर शल्य को युद्ध
क्षेत्र से भगा देते हैं।

यह देखकर एकभार भीष्म फिर से पांडव
सेना का भयंकर संहार करते हैं।
 
विराट पुत्र शंख के मारे जाने से इस दिन
कौरव पक्ष की क्षति होती है।

कौन मजबूत रहा :
इस दोनों ही पक्ष ने डट कर मुकाबला किया।
 
आठवें दिन का युद्ध :

कौरवों ने कछुआ व्यूह तो पांडवों ने तीन
शिखरों वाला व्यूह रचा।

पांडव पुत्र भीम धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का
वध कर देते हैं।
अर्जुन की दूसरी पत्नी उलूपी के पुत्र
इरावान का बकासुर के पुत्र आष्ट्रयश्रंग
(अम्बलुष) के द्वारा वध कर दिया जाता है।
 
घटोत्कच द्वारा दुर्योधन पर शक्ति का
प्रयोग किया गया परंतु बंगनरेश ने दुर्योधन
को हटाकर शक्ति का प्रहार स्वयं के ऊपर
ले लिया तथा बंगनरेश की मृत्यु हो जाती है।

इस घटना से दुर्योधन के मन में मायावी
घटोत्कच के प्रति भय व्याप्त हो जाता है।
 
तब भीष्म की आज्ञा से भगदत्त घटोत्कच
को हराकर भीम, युधिष्ठिर व अन्य पांडव
सैनिकों को पीछे ढकेल देता है।
दिन के अंत तक भीमसेन धृतराष्ट्र के नौ
और पुत्रों का वध कर देता है।
 
पांडव पक्ष की क्षति :
अर्जुन पुत्र इरावान का अम्बलुष द्वारा वध।
कौरव पक्ष की क्षति : धृतराष्ट्र के 17 पुत्रों
का भीम द्वारा वध।

कौन मजबूत रहा :
इस दोनों ही पक्ष ने डट किया और दोनों
ही पक्ष को नुकसान उठाना पड़ा।

हालांकि कौरवों को ज्यादा क्षति पहुंची।

नौवें दिन का युद्ध :
कृष्ण के उपदेश के बाद भयंकर युद्ध हुआ
जिसके चलते भीष्म ने बहादुरी दिखाते हुए
अर्जुन को घायल कर उनके रथ को जर्जर
कर दिया।
युद्ध में आखिरकार भीष्म के भीषण संहार
को रोकने के लिए कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा
तोड़नी पड़ती है।

उनके जर्जर रथ को देखकर श्रीकृष्ण रथ
का पहिया लेकर भीष्म पर झपटते हैं,
लेकिन वे शांत हो जाते हैं,परंतु इस दिन
भीष्म पांडवों की सेना का अधिकांश
भाग समाप्त कर देते हैं।
 
कौन मजबूत रहा : कौरव
 
दसवां दिन :
भीष्म द्वारा बड़े पैमाने पर पांडवों की सेना
को मार देने से घबराए पांडव पक्ष में भय
फैल जाता है,तब श्रीकृष्ण के कहने पर
पांडव भीष्म के सामने हाथ जोड़कर
उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछते हैं।

भीष्म कुछ देर सोचने पर उपाय बता देते हैं।
 
इसके बाद भीष्म पांचाल तथा मत्स्य सेना
का भयंकर संहार कर देते हैं।
फिर पांडव पक्ष युद्ध क्षे‍त्र में भीष्म के सामने
शिखंडी को युद्ध करने के लिए लगा देते हैं।

युद्ध क्षेत्र में शिखंडी को सामने डटा देखकर
भीष्म ने अपने अस्त्र त्याग दिए।

इस दौरान बड़े ही बेमन से अर्जुन ने अपने
बाणों से भीष्म को छेद दिया।

भीष्म बाणों की शरशय्या पर लेट गए।

भीष्म ने बताया कि वे सूर्य के उत्तरायण
होने पर ही शरीर छोड़ेंगे,
क्योंकि उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छा
मृत्यु का वर प्राप्त है।
 
पांडव पक्ष की क्षति : शतानीक
कौरव पक्ष की क्षति : भीष्म
कौन मजबूत रहा : पांडव

ग्यारहवें दिन :
भीष्म के शरशय्या पर लेटने के बाद
ग्यारहवें दिन के युद्ध में कर्ण के कहने
पर द्रोण सेनापति बनाए जाते हैं।

ग्यारहवें दिन सुशर्मा तथा अर्जुन,शल्य
तथा भीम, सात्यकि तथा कर्ण और सहदेव
तथा शकुनि के मध्य युद्ध हुआ।
कर्ण भी इस दिन पांडव सेना
का भारी संहार करता है।
 
दुर्योधन और शकुनि द्रोण से कहते हैं कि
वे युधिष्ठिर को बंदी बना लें तो युद्ध अपने
आप खत्म हो जाएगा,तो जब दिन के अंत
में द्रोण युधिष्ठिर को युद्ध में हराकर उसे
बंदी बनाने के लिए आगे बढ़ते ही हैं कि
अर्जुन आकर अपने बाणों की वर्षा से
उन्हें रोक देता है।

नकुल,युधिष्ठिर के साथ थे व अर्जुन भी
वापस युधिष्ठिर के पास आ गए।
इस प्रकार कौरव युधिष्ठिर
को नहीं पकड़ सके।
 
पांडव पक्ष की क्षति : विराट का वध
कौन मजबूत रहा : कौरव
 
बारहवें दिन का युद्ध :
कल के युद्ध में अर्जुन के कारण युधिष्ठिर
को बंदी न बना पाने के कारण शकुनि व
दुर्योधन अर्जुन को युधिष्ठिर से काफी दूर
भेजने के लिए त्रिगर्त देश के राजा को
उससे युद्ध कर उसे वहीं युद्ध में व्यस्त
बनाए रखने को कहते हैं,वे ऐसा करते
भी हैं,परंतु एक बार फिर अर्जुन समय
पर पहुंच जाता है और द्रोण असफल
हो जाते हैं।
 
होता यह है कि जब त्रिगर्त, अर्जुन को
दूर ले जाते हैं तब सात्यकि,युधिष्ठिर के
रक्षक थे।

वापस लौटने पर अर्जुन ने प्राग्ज्योतिषपुर
(पूर्वोत्तर का कोई राज्य) के राजा भगदत्त
को अर्धचंद्र को बाण से मार डाला।

सात्यकि ने द्रोण के रथ का पहिया काटा
और उसके घोड़े मार डाले।
द्रोण ने अर्धचंद्र बाण द्वारा सात्यकि
का सिर काट ‍लिया।
 
सात्यकि ने कौरवों के अनेक उच्च कोटि
के योद्धाओं को मार डाला जिनमें से प्रमुख
जलसंधि,त्रिगर्तों की गजसेना,सुदर्शन,
म्लेच्छों की सेना,भूरिश्रवा,कर्णपुत्र प्रसन थे।

युद्ध भूमि में सात्यकि को भूरिश्रवा से कड़ी
टक्कर झेलनी पड़ी।
हर बार सात्यकि को कृष्ण
और अर्जुन ने बचाया।
 
पांडव पक्ष की क्षति : द्रुपद
कौरव पक्ष की क्षति : त्रिगर्त नरेश
कौन मजबूत रहा : दोनों

तेरहवें दिन :
कौरवों ने चक्रव्यूह की रचना की।
इस दिन दुर्योधन राजा भगदत्त को अर्जुन
को व्यस्त बनाए रखने को कहते हैं।
भगदत्त युद्ध में एक बार फिर से पांडव
वीरों को भगाकर भीम को एक बार फिर
हरा देते हैं फिर अर्जुन के साथ भयंकर
युद्ध करते हैं।
श्रीकृष्ण भगदत्त के वैष्णवास्त्र को अपने
ऊपर ले उससे अर्जुन की रक्षा करते हैं।
 
अंततः अर्जुन भगदत्त की आंखों की पट्टी
को तोड़ देता है जिससे उसे दिखना बंद हो
जाता है और अर्जुन इस अवस्था में ही छल
से उनका वध कर देता है।

इसी दिन द्रोण युधिष्ठिर के लिए चक्रव्यूह
रचते हैं जिसे केवल अभिमन्यु तोड़ना
जानता था,परंतु निकलना नहीं जानता था।

अतः अर्जुन युधिष्ठिर,भीम आदि को उसके
साथ भेजता है,परंतु चक्रव्यूह के द्वार पर वे
सबके सब जयद्रथ द्वारा शिव के वरदान के
कारण रोक दिए जाते हैं और केवल
अभिमन्यु ही प्रवेश कर पाता है। 
 
ये लोग करते हैं अभिमन्यु का वध :
कर्ण के कहने पर सातों महारथियों कर्ण,
जयद्रथ,द्रोण,अश्वत्थामा,दुर्योधन,लक्ष्मण
तथा शकुनि ने एकसाथ
अभिमन्यु पर आक्रमण किया।

लक्ष्मण ने जो गदा अभिमन्यु के सिर पर
मारी वही गदा अभिमन्यु ने लक्ष्मण को
फेंककर मारी।
इससे दोनों की उसी समय मृत्यु हो गई।
 
अभिमन्यु के मारे जाने का समाचार सुनकर
जयद्रथ को कल सूर्यास्त से पूर्व मारने की
अर्जुन ने प्रतिज्ञा की अन्यथा अग्नि समाधि
ले लेने का वचन दिया।
 
पांडव पक्ष की क्षति : अभिमन्यु
कौन मजबूत रहा : पांडव
 
चौदहवें दिन : अर्जुन की अग्नि समाधि वाली
बात सुनकर कौरव पक्ष में हर्ष व्याप्त हो जाता
है और फिर वे यह योजना बनाते हैं कि आज
युद्ध में जयद्रथ को बचाने के लिए सब कौरव
योद्धा अपनी जान की बाजी लगा देंगे।

द्रोण जयद्रथ को बचाने का पूर्ण
आश्वासन देते हैं और उसे सेना के
पिछले भाग में छिपा देते हैं।
 
युद्ध शुरू होता है।
भूरिश्रवा,सात्यकि को मारना चाहता था
तभी अर्जुन ने भूरिश्रवा के हाथ काट दिए,
वह धरती पर गिर पड़ा तभी सात्यकि ने
उसका सिर काट दिया।
द्रोण द्रुपद और विराट को मार देते हैं।
 
तब कृष्ण अपनी माया से सूर्यास्त कर देते हैं।
सूर्यास्त होते देख अर्जुन अग्नि समाधि की
तैयारी करने लगे जाते हैं।

छिपा हुआ जयद्रथ जिज्ञासावश अर्जुन को
अग्नि समाधि लेते देखने के लिए बाहर
आकर हंसने लगता है,उसी समय श्रीकृष्ण
की कृपा से सूर्य पुन: निकल आता है और
तुरंत ही अर्जुन सबको रौंदते हुए कृष्ण द्वारा
किए गए क्षद्म सूर्यास्त के कारण बाहर आए
जयद्रथ को मारकर उसका मस्तक
उसके पिता के गोद में गिरा देते हैं।
 
पांडव पक्ष की क्षति : द्रुपद, विराट
कौरव पक्ष की क्षति : जयद्रथ, भगदत्त,

पंद्रहवें दिन :
द्रोण की संहारक शक्ति के बढ़ते जाने से
पांडवों के ‍खेमे में दहशत फैल गई।
पिता-पुत्र ने मिलकर महाभारत युद्ध में
पांडवों की हार सुनिश्चित कर दी थी।
पांडवों की हार को देखकर श्रीकृष्ण ने
युधिष्ठिर से छल का सहारा लेने को कहा।

इस योजना के तहत युद्ध में यह बात फैला
दी गई कि 'अश्वत्थामा मारा गया',लेकिन
युधिष्‍ठिर झूठ बोलने को तैयार नहीं थे।

तब अवंतिराज के अश्‍वत्थामा नामक
हाथी का भीम द्वारा वध कर दिया गया।
इसके बाद युद्ध में यह बाद फैला दी गई कि
'अश्वत्थामा मारा गया'।
 
जब गुरु द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से
अश्वत्थामा की सत्यता जानना चाही तो
उन्होंने जवाब दिया- 'अश्वत्थामा मारा गया,
परंतु हाथी।'

श्रीकृष्ण ने उसी समय शंखनाद किया
जिसके शोर के चलते गुरु द्रोणाचार्य
आखिरी शब्द 'हाथी' नहीं सुन पाए और
उन्होंने समझा मेरा पुत्र मारा गया।

यह सुनकर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए और
युद्ध भूमि में आंखें बंद कर शोक में डूब गए।
यही मौका था जबकि द्रोणाचार्य को निहत्था
जानकर द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार
से उनका सिर काट डाला।
 
कौरव पक्ष की क्षति : द्रोण
कौन मजबूत रहा : पांडव
 
सोलहवें दिन का युद्ध :
द्रोण के छल से वध किए जाने के बाद कौरवों
की ओर से कर्ण को सेनापति बनाया जाता है।

कर्ण पांडव सेना का भयंकर संहार करता है
और वह नकुल व सहदेव को युद्ध में हरा देता
है,परंतु कुंती को दिए वचन को स्मरण कर
उनके प्राण नहीं लेता।
फिर अर्जुन के साथ भी भयंकर संग्राम करता है।
 
दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने अमोघ शक्ति
द्वारा घटोत्कच का वध कर दिया।
यह अमोघ शक्ति कर्ण ने अर्जुन के लिए
बचाकर रखी थी लेकिन घटोत्कच से घबराए
दुर्योधन ने कर्ण से इस शक्ति का इस्तेमाल
करने के लिए कहा।

यह ऐसी शक्ति थी जिसका वार कभी खाली
नहीं जा सकता था।
कर्ण ने इसे अर्जुन का वध करने के
लिए बचाकर रखी थी।
 
इस बीच भीम का युद्ध दुःशासन के साथ
होता है और वह दु:शासन का वध कर
उसकी छाती का रक्त पीता है और अंत
में सूर्यास्त हो जाता है।
 
कौरव पक्ष की क्षति : दुःशासन
कौन मजबूत रहा : दोनों

सत्रहवें दिन :
शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया।
इस दिन कर्ण भीम और युधिष्ठिर को
हराकर कुंती को दिए वचन को स्मरण
कर उनके प्राण नहीं लेता।
बाद में वह अर्जुन से युद्ध करने लग
जाता है।
कर्ण तथा अर्जुन के मध्य
भयंकर युद्ध होता है।
कर्ण के रथ का पहिया धंसने पर श्रीकृष्ण
के इशारे पर अर्जुन द्वारा असहाय अवस्था
में कर्ण का वध कर दिया जाता है।
 
इसके बाद कौरव अपना
उत्साह हार बैठते हैं।

उनका मनोबल टूट जाता है।
फिर शल्य प्रधान सेनापति बनाए गए,
परंतु उनको भी युधिष्ठिर दिन के अंत
में मार देते हैं।
 
कौरव पक्ष की क्षति : कर्ण,शल्य और
दुर्योधन के 22 भाई मारे जाते हैं।
कौन मजबूत रहा : पांडव

अठारहवें दिन का युद्ध :
अठारहवें दिन कौरवों के तीन योद्धा शेष
बचे- अश्‍वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा।
इसी दिन अश्वथामा द्वारा पांडवों के वध की
प्रतिज्ञा ली गई।

सेनापति अश्‍वत्थामा तथा कृपाचार्य के
कृतवर्मा द्वारा रात्रि में पांडव शिविर पर
हमला किया गया।

अश्‍वत्थामा ने सभी पांचालों,द्रौपदी के
पांचों पुत्रों,धृष्टद्युम्न तथा शिखंडी आदि
का वध किया।

पिता को छलपूर्वक मारे जाने का जानकर
अश्वत्थामा दुखी होकर क्रोधित हो गए और
उन्होंने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया जिससे
युद्ध भूमि श्मशान भूमि में बदल गई।

यह देख कृष्ण ने उन्हें कलियुग के अंत तक
कोढ़ी के रूप में जीवित रहने का शाप दे डाला।

इस दिन भीम दुर्योधन के बचे हुए भाइयों
को मार देता है,सहदेव शकुनि को मार देता
है और अपनी पराजय हुई जान दुर्योधन
भागकर सरोवर के स्तंभ में जा छुपता है।

इसी दौरान बलराम तीर्थयात्रा से वापस
आ गए और दुर्योधन को निर्भय रहने का
आशीर्वाद दिया। 

छिपे हुए दुर्योधन को पांडवों द्वारा ललकारे
जाने पर वह भीम से गदा युद्ध करता है और
छल से जंघा पर प्रहार किए जाने से उसकी
मृत्यु हो जाती है।
इस तरह पांडव विजयी होते हैं।

पांडव पक्ष की क्षति : द्रौपदी के पांच पुत्र,
धृष्टद्युम्न,शिखंडी
कौरव पक्ष की क्षति : दुर्योधन

कुछ यादव युद्ध में और बाद में गांधारी के
शाप के चलते आपसी युद्ध में मारे गए।
पांडव पक्ष के विराट और विराट के पुत्र उत्तर,
शंख और श्वेत,सात्यकि के दस पुत्र,अर्जुन पुत्र
इरावान,द्रुपद,द्रौपदी के पांच पुत्र,धृष्टद्युम्न,
शिखंडी,कौरव पक्ष के कलिंगराज भानुमान,
केतुमान,अन्य कलिंग वीर,प्राच्य,सौवीर,
क्षुद्रक और मालव वीर।
 
कौरवों की ओर से धृतराष्ट्र के दुर्योधन सहित
सभी पुत्र,भीष्म,त्रिगर्त नरेश,जयद्रथ,भगदत्त,
द्रौण,दुःशासन,कर्ण,शल्य आदि सभी युद्ध में
मारे गए थे।
 
युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध की समाप्ति पर
बचे हुए मृत सैनिकों का(चाहे वे शत्रु वर्ग के
हों अथवा मित्र वर्ग के)दाह-संस्कार एवं
तर्पण किया था।

इस युद्ध के बाद युधिष्ठिर को राज्य,धन,
वैभव से वैराग्य हो गया।
 
कहते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद अर्जुन
अपने भाइयों के साथ हिमालय चले गए
और वहीं उनका देहांत हुआ।
 
बच गए योद्धा : महाभारत के युद्ध के पश्चात
कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ
से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे
थे जिनके नाम हैं- कौरव के : कृतवर्मा,
कृपाचार्य और अश्वत्थामा,जबकि पांडवों
की ओर से युयुत्सु,युधिष्ठिर,अर्जुन,भीम,
नकुल,सहदेव,कृष्ण, सात्यकि आदि।

सदा सर्वदासुमंगल💐
हर हर महादेव💐
ॐ नमो नारायणाय💐
जयभवानी💐
जयश्रीराम💐