रविवार, 3 अप्रैल 2016

लोक गीत

हृदय से फूटा
कंठ से निकला
अधरों पर छलकता
आदिम राग ।

संभावना

संभावना है
अभी भी संभावना है
अपने भविष्य पर
मुस्कुराता
वर्तमान है ।

सफर में कांटे
अनगिन
जरा संभाल
यह समय
खण्डित ।

काफी नहीं
अपनी गाथा
उसकी भी
सुन ।

पसरा पतझड़
मध्य
वसंत ।

संभावना है ।।

गुरुवार, 31 मार्च 2016

ओ ; मेरे !!!

सिलसिला
     चाहत का
              यूँ ही
चिराग
      इश्क का
               यूँ ही
सपनों में
       बस तू ही
                यूँ ही
दिल में
      बसता
           बस तू ही
                   यूँ ही
ओ ; मेरे !!!!

मंगलवार, 22 मार्च 2016

कल्पना मनोरमा


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--------------एक गीतिका ---------------
मित्रों ! होलिका उत्सव की बधाई !!!!

महका मन मन कचनार सखी
पसरी बन-बन गुलनार सखी ॥
""
कुलों में कलरव बतरस सी
छलका मधुरिम सा प्यार सखी ॥
""
रसिया मन बसिया खेल रहो
चनियां रंगती ब्रजनार सखी ॥
""
यमुना जल लेके परात खड़ी
कृष्णा जायें वलिहार सखी ॥
""
झरता सौरभ उर खोल-खोल
वन लहकी जाय बहार सखी ॥
""
उर लाय लईं सुषमा श्यामा
बरसी है रंगन फुहार सखी ॥
""
कल्पना मनोरमा

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

डॉ राजरानी के उद्गार

अक़्ल का सरमाया पास न हो
तो सरम भी
जल्दी चली जाती है ...... !
अक़्ल की तिजोरी
भरी दिखाने के चक्कर में
दिमाग़ी ग़रीब
जो करतब न कर लें वो कम हैं ... !
अंदर का अजूबापन ....
जमूरापन ...
सब बेमतलब बाज़ीगरी
करने में छलक जाता है !
नयेपन की खोज
बेख़ौफ़ बेवक़ूफ़ियों तक
अनजाने में ले जाती है
बेहूदापन मानो फ़ैशन है 
लाओ नये से नये
ग़लीज़ बेहूदगी भरे जुमले .... !
शायद छा जायें ....
फिर चाहे क्यों न
देश को बेच खायें ....
संस्कृति को चबा जायें
मूल्यों को गिरबी रख आयें ....
आत्मा को खूँटी पर
उलटा लटका आयें
पर नया अजूबा तो कर जायें !

राज ...




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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

प्रियंका ओम की कहानियों में

नाम कॉमन हो सकता है | पर कहानियाँ नही | सच लिखती हैं | बेहिचक लिखती हैं |  बिन्दास लिखती हैं | इन की कहानियों मे समाज का कड़वा सच है | ज़िंदगी की फंतासियाँ हैं तो , जादूई यथार्थ भी | रिश्तो की नाजुक डोर है, तो स्वार्थ की गाँठ भी …………………

इंग्लिश लिट्रेचर से ग्रेजुएट हैं और हिंदी से गजब का लगाव |
बचपन रेशम के शहर भागलपुर मे बीता, पर ज़िंदगी रेशमी नही रही |
लौहनगरी जमशेदपुर मे इरादे और हौसले दोनों जवान हुऐ  | फ़िर हाल  वे तंजानिया मे रह रही हैं …|||
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तुम्हारे लिये मेरा प्यार  मंदिर मे बजने वाली घंटियों सा था , त्वरित भी और स्वरित भी ,  लेकिन तुम मंदिर में स्थापित मूर्तियों से मौन, जो मुझे छोड़ आते थे मेरे ही वियाबान में ||
…[ खुदगर्ज प्यार ]…
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पैसा पावर और प्रमोशन, ऐसी बहुत सी जिजिविषा हैं   जिसके लिये उन्हे अपनी आत्मा को मारना पड़ता है और ज़िंदगी भर ढोतें हैं सिर्फ शरीर ...||
…[ इमोशन ]…
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मेरे अधूरे उपन्यास के पन्नो की तरह बिखरी हुई है तुम्हारी यादें …||
…[ यादों की डायरी ]…
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सिगरेट होठों से लगाने से पहले वो अपने होठों पर वेसलीन की एक परत लगाती | उसके होठ अब भी गुलाबी थे सिर्फ खून जलता था होठ नही..||
…[ वो अजीब लड़की ]…
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वो आयी तो थी अर्जुन को उसके कमाऐ पैसे खरच करने का तरीका बताने लेकिन खुद ही खरच हो गयी थी |  एक ही बार मे बिना सोचे समझे किसी एड्वाइजर की सलाह के अर्जुन ने एक चेक साईन करने के साथ साथ अपनी ज़िंदगी भी उसके नाम कर दी …||
…[ सॉरी ]…
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"तुम सौतेली हो" मन की दीवारो पर कील की तरह धँसती जा रही थी , और उपेक्षा हथौडी  की तरह बार बार उस पर प्रहार कर रही थी, पुराने फ़टे कपडो पर पैबंद और नये कपडे मे तुरपाई की तरह समाज और रिश्तो की लाज की खातिर पापा भूले बिसरे  याद कर लेते किंतु दबाव की वजह से चप्पल पर बन गये पैर के निशान और गीली मिट्टी पर बने निशान मे बहुत फर्क होता है | और वो फर्क बहुत साफ़ साफ़ दिख जाता है …||
…[ सौतेलापन ]…
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आज फेयरवेल पार्टी है , लेडी डारसी , विजय और शैलजा तीनो स्माईल कर रहे थे, शैलजा ने शिफान की साडी पहनी है और विजय ने ब्लू सर्ट ||
…[ फेयरनेस क्रीम ]…
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सुर्पनखा को एक और संबोधन  मिला था "भाभी जी" जो दूर से ही उसके कांन मे पड़ता था | लेकिन लाल बाबू के लिये अब वो सिर्फ "सुरपा" थी, एक दिन कहा भी था "जानती हो कुरुप घरवाली को ऐगो बहुत बड़ फ़ायदा है किसी का मन नही ललचाता |"
कह कर जोर से हसे थे लाल बाबू लेकिन सुरपा की आखों से आंसु तैर गये थे ||
…[ लाल बाबू ]…
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"वो जाना नही चाहती थी |" लेकिन जाना पडा था | क्यो कि मैने रोका नही | लेकिन कई हिंदी फ़िल्मो के द्र्श्य की तरह उसके इंतजार में मैं काफ़ी देर तक एअरपोर्ट के बाहर ही रुका रहा कि शायद जानबूझ कर  फ्लाइट छोड़ दे और फ़िर से मेरे पास लौट आये  | लेकिन ज़िंदगी कोई हिंदी फ़िल्म नहीं |
…[ फिरंगन की मोहब्बत ]…
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काश इस दुनिया मे ज़िंदगी के व्यापार होते तो इंसान उम्र के भी सौदे करता |
वैसे तो ज़िंदगी के सारे ही सच कड़वे ही होते हैं लेकिन कुछ सच इतने कड़वे होते हैं कि अपनी कड़वाहट से न केवल आपके समुचे अस्तिव को बल्कि आपकी समूची ज़िंदगी को विशैला कर देते हैं ||
…[ मौत की ओर ]…
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"हल्दी लगे, मडवा चढे
अम्मा का कलेजा फटे |"

अब अम्मा गुलाबी को क्या बताती कि जो सपना वह देख रही है वो तो कब का टूट गया है और उसकी किरचन ज़िंदगी भर गडेगी  | अल्हड़ गुलाबी को कहाँ पता था की उसकी अम्मा उसके बियाह की खुशी से नही दुख से रो रही है |
एक तरफ बड़की रनिया है तो दूसरी तरफ छोटकी | एक का जीवन सवर रहा है तो दूसरी का बरबाद हो रहा है ! कैसे बतायें बिटिया को  की अम्मा का कलेजा तलवार की धार पर है ||

…[ बाबा भोले नाथ की जय ]…
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अपने मन के विकार को भी शब्दो का मुखौटापहना दिया था | उन के लिये उनका नंगापन उत्सव था | उस महा पुरुष को उसके मन की विकृतिने एक साधारण सी स्त्री से समक्ष बौना बना दिया | घुटने टेक दिये हाथ जोड़ दिये | वो जादूई आखें गिरगिरा ऊठी | एक स्त्री के सब कुछ को उन्होने छुटटे पैसो की संज्ञा दी थी | ये उस महाज्ञानी की अज्ञानता नही तो और क्या थी ??
…[ दोगला ]…
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दूर से काँच के गिलास मे चाय गर्म खून , और जलती हूई सिगरेट चिता की लकडिया लग रही थी …||
…[ लवारिस लास ]…
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औरत का मन कच्ची मिट्टी सा होता है , जिस सांचे मे ढालो ढल जाता है | पूछने पर उसने कहा वो यायावर है, ज़िंदगी की खाक छानता यहाँ वहाँ भटकता रहता है | कुछ ढूँढ रहा है शायद, वो जो उससे बहुत पहले खो गया है | उसका अस्तिव दर्द मे डूबा हूआ है | एक ऐसा दर्द जिसे वो स्वयं भी नही पहचानता |  उसे किसी खास किस्म की जडी बूटी की तलाश थी जो उस के दिल के दर्द की दवा बन सके | उस के अंदर दिन रात कुछ जल रहा है | एक ऐसी आग जिस ने उसकी आत्मा को शम्शान बना दिया | सुकुन की तलास ने उस के अंदर एक निराशा भर दी है ऐसी निराशा उस के अंदर के सृजनत्मक उर्जा को जला डाला | किसी की तलास है उसे , वो न्श्वर शरीर का लोलुप नही | उसे तो उस आत्मा की तलास थी जिस के साथ सम्भोग कर के वो  अनंत मे विलीन हो जाय …||
…[ मृगमरीचिका ]…
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आप की सारी कहानिया बहुत अच्छी लगी.

[ Priyanka Om ]
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1563857357267391&id=100009294244521

सोनप्रिया


From Sonpriya Series........

सुनो शोना
आज मेरा मन है डूब जाने का
बहुत गहरा , इतना गहरा कि सांस भी न ले सकूँ
कान , नाक , मुहँ , सब बंद हो जाएँ
बस डूबने का अहसास बचा रहे
जितना गहरा डूबो उतना ही गहरा आनंद
तुमने कहा था मैं फ़ना होने के रास्ते पे निकल चुकी हूँ
एक बार चल दो तो कोई लौटना नहीं , कोई ऑप्शन ही नहीं लौटने की
एक बार आनंद का अमृत चख लौटना भी कौन चाहेगा
यह तो ऐसी लत है जिसका कोई दवा -दारु नहीं

कुछ दिन पहले तुम्हारे भेजे हुए सब संदेसे जो कहीं खो गए थे , अचानक से बाहर आ गए
जैसे समुन्दर अपनी लहरों के साथ ढेर सारी सीपियाँ छोड़ गया हो रेत पे
एक -एक सीपी खोल कर एक -एक मोती निकाल रही हूँ और डूबती जा रही हूँ
किसी दिन यह समुन्दर सीपियाँ यहाँ छोड़ कर मुझे उठा कर ले जाएगा
पर अभी कुछ वक़्त है फ़ना होने में
कुछ काम बाकी हैं अभी
हाँ , यूँ तो काम कभी खत्म नहीं होते , ज़िंदगी के साथ -साथ चलते रहते हैं
पर मैंने एक तारीख़ मुकरर्र कर ली है
जानती हूँ , अपने हाथ में नहीं है कुछ भी , करने वाला तो सब वो ही है
पर फिर भी एक रेखा खींच देना कुछ तो रंग लाएगा
अरे नहीं , घबराओ मत , मैं मरने वाली नहीं अभी
वैसे भी यह मरना कोई मरना थोड़े ही है , तुम्ही तो कहते हो
असल मरना तो जीते जी होता है , अहं का मर जाना , अपनी मैं से ऊपर उठ जाना

अरे अरे , तुम तो उदास हो गए , ऐसे ही मैं भी हो गई थी जब एक बार तुमने कहा था
मैं शायद मरने वाला हूँ
और दूसरे ही पल मुझे लगा अगर तुम मर गए तो मेरा बेटा बन कर लौटोगे
नौं महीने मेरी कोख में रहोगे , इतना करीब , इतना ज़्यादा करीब
मेरी सांस में सांस लोगे
मेरी धड़कन में धड्कोगे
सब से ज़्यादा निश्चल प्यार एक औरत अपने बेटे को करती है , बिना किसी आस उम्मीद के
क्या पता मैं तुम्हारी बेटी बन कर आऊँ
जब तक सच में नहीं मर जाते , आना जाना तो लगा ही रहेगा , किसी न किसी रूप में मिलते ही रहेंगे
तो मौत कोई डरने की चीज़ नहीं है , उतस्व है , ज़िंदगी के जैसे ही
अवसर है खुद के , खुदा के एक कदम और करीब होने का

अब तुम कहोगे , माते आज इतने प्रवचन क्यों दे रही हो , यह तो मेरा क्षेत्र है
तुम्हारा मुर्शिद तो मैं ठहरा
हाँ , मुर्शिद भी , मेहबूब भी
कई बार सोचती हूँ , अब न करूँ तुम से मोहब्बत
तुम बहुत खराब हो
कितने -कितने दिन छोड़ के चले जाते हो
न कोई संदेसा , न खत , न पत्र , न कोई खोज ख़बर
पर , जानू , मजबूरी हो चुकी है मेरी
तुम से नहीं करती  मोहब्बत तो खुद से भी नहीं कर पाती
सारा जग जैसे सूना -सूना हो जाता है
न चिड़ियाँ चहकती हैं , न फूल महकते हैं , न चाँद मुस्कुराता है
मीठा , मीठा नहीं लगता , नमकीन , नमकीन नहीं लगता
जुबान जलती है तो पता चलता है चाय गर्म थी
कुछ भी अच्छा नहीं लगता
तुमसे प्यार करती हूँ तो सारा ब्रह्माण्ड नाचता रहता है , गीत गाता रहता है
तुम्हारे इश्क़ में सारा जग है इबादतगाह , जहाँ मर्ज़ी बैठ कर कर लो सजदा
हर शै दिव्य , अलौकिक , क्या चेतन , क्या अचेतन
हर मौसम खुशगवार
आजकल ऐसे लग रहा है जैसे बसंत ऋतू हो हालंकि पेड़ों पे कोई पत्ते नहीं हैं
अभी भी पक्षिमी हवाएं चल रही हैं
मेरे जैसे वो गिलहरी भी इश्क़ में लगती , उसने भी ऐलान कर दिया , बहार आने को है
मन आन्दित तो हर दिन दिवाली
सारा खेल तो मन का ही है , कुछ भी कर सकता है
वही कमरा , वही बिस्तर , वही परदे , कभी स्वर्ग के जैसे तो कभी नरक के

तो तुम कैसे हो , शोना
जानती हूँ , तुम भी कभी कभी सोचते हो मुझ से दूर जाने को
बहुत मरहले हैं जो तुम्हें पार करने हैं
पर तुम्हारे भी बस में नहीं है
तुम्हारे भी पग लंबे हो जाते हैं जब मैं साथ होती हूँ
कई द्वार खुल जाते हैं , कई राज़ प्रगट होते हैं
हमारी शक्तियाँ synchronize करती हैं और हमें बहुत आगे तक ले जाती हैं
एक लौ हो कर हम समस्त ब्रह्माण्ड में विचर आते हैं कुछ ही पलों में
जो कई कई लाइट यीर्ज़ light years  में नहीं हो सकता , इश्क़ में एक ही पल में हो जाता है
तुमने एक बार कहा था , कभी यह फैसला लेने की कोशिश मत करना
मेरे साथ होना है या नहीं
फैसले उसी को करने दो
सब फैसले उसी के हैं और सब हमारे हित में हैं
तो जानम , तुम भी , कुछ भी सोचना छोड़ दो
बस आनंद को पियो जो तुम्हारे और मेरे इश्क़ ने हमें बक्शा है
चलो , डूबते है न
बहुत गहरा
जहाँ सांस भी न आए

वो जो मैंने अपनी तस्वीर उतारी हैं न फिरोजी चश्में वाली
मुझे पता है , देख कर तुम ज़ोर ज़ोर से हँसे होंगे
सच पूछो तो मैंने वो जान बूझ कर लगाई
बहुत देर हो गई तुम्हारे ठहाकों की आवाज़ें नहीं सुनी
याद है पहले भी एक बार एक तस्वीर जो सबने पसंद की
और तुमने कहा ऐसे है जैसे मैट्रिमोनीयल ऐड दे रही हो
तुम्हारा कुछ भी कहना दुनिया भर से प्यारा है

हँसो , हँसो , ज़ोर से हँसो
हँसते हो तो तुम पे और भी ज़्यादा प्यार आता है

तुम्हारी अपनी
सोनप्रिया https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=945696118811633&id=100001137609210


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