अक़्ल का सरमाया पास न हो
तो सरम भी
जल्दी चली जाती है ...... !
अक़्ल की तिजोरी
भरी दिखाने के चक्कर में
दिमाग़ी ग़रीब
जो करतब न कर लें वो कम हैं ... !
अंदर का अजूबापन ....
जमूरापन ...
सब बेमतलब बाज़ीगरी
करने में छलक जाता है !
नयेपन की खोज
बेख़ौफ़ बेवक़ूफ़ियों तक
अनजाने में ले जाती है
बेहूदापन मानो फ़ैशन है
लाओ नये से नये
ग़लीज़ बेहूदगी भरे जुमले .... !
शायद छा जायें ....
फिर चाहे क्यों न
देश को बेच खायें ....
संस्कृति को चबा जायें
मूल्यों को गिरबी रख आयें ....
आत्मा को खूँटी पर
उलटा लटका आयें
पर नया अजूबा तो कर जायें !
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