नाम कॉमन हो सकता है | पर कहानियाँ नही | सच लिखती हैं | बेहिचक लिखती हैं | बिन्दास लिखती हैं | इन की कहानियों मे समाज का कड़वा सच है | ज़िंदगी की फंतासियाँ हैं तो , जादूई यथार्थ भी | रिश्तो की नाजुक डोर है, तो स्वार्थ की गाँठ भी …………………
इंग्लिश लिट्रेचर से ग्रेजुएट हैं और हिंदी से गजब का लगाव |
बचपन रेशम के शहर भागलपुर मे बीता, पर ज़िंदगी रेशमी नही रही |
लौहनगरी जमशेदपुर मे इरादे और हौसले दोनों जवान हुऐ | फ़िर हाल वे तंजानिया मे रह रही हैं …|||
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तुम्हारे लिये मेरा प्यार मंदिर मे बजने वाली घंटियों सा था , त्वरित भी और स्वरित भी , लेकिन तुम मंदिर में स्थापित मूर्तियों से मौन, जो मुझे छोड़ आते थे मेरे ही वियाबान में ||
…[ खुदगर्ज प्यार ]…
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पैसा पावर और प्रमोशन, ऐसी बहुत सी जिजिविषा हैं जिसके लिये उन्हे अपनी आत्मा को मारना पड़ता है और ज़िंदगी भर ढोतें हैं सिर्फ शरीर ...||
…[ इमोशन ]…
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मेरे अधूरे उपन्यास के पन्नो की तरह बिखरी हुई है तुम्हारी यादें …||
…[ यादों की डायरी ]…
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सिगरेट होठों से लगाने से पहले वो अपने होठों पर वेसलीन की एक परत लगाती | उसके होठ अब भी गुलाबी थे सिर्फ खून जलता था होठ नही..||
…[ वो अजीब लड़की ]…
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वो आयी तो थी अर्जुन को उसके कमाऐ पैसे खरच करने का तरीका बताने लेकिन खुद ही खरच हो गयी थी | एक ही बार मे बिना सोचे समझे किसी एड्वाइजर की सलाह के अर्जुन ने एक चेक साईन करने के साथ साथ अपनी ज़िंदगी भी उसके नाम कर दी …||
…[ सॉरी ]…
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"तुम सौतेली हो" मन की दीवारो पर कील की तरह धँसती जा रही थी , और उपेक्षा हथौडी की तरह बार बार उस पर प्रहार कर रही थी, पुराने फ़टे कपडो पर पैबंद और नये कपडे मे तुरपाई की तरह समाज और रिश्तो की लाज की खातिर पापा भूले बिसरे याद कर लेते किंतु दबाव की वजह से चप्पल पर बन गये पैर के निशान और गीली मिट्टी पर बने निशान मे बहुत फर्क होता है | और वो फर्क बहुत साफ़ साफ़ दिख जाता है …||
…[ सौतेलापन ]…
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आज फेयरवेल पार्टी है , लेडी डारसी , विजय और शैलजा तीनो स्माईल कर रहे थे, शैलजा ने शिफान की साडी पहनी है और विजय ने ब्लू सर्ट ||
…[ फेयरनेस क्रीम ]…
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सुर्पनखा को एक और संबोधन मिला था "भाभी जी" जो दूर से ही उसके कांन मे पड़ता था | लेकिन लाल बाबू के लिये अब वो सिर्फ "सुरपा" थी, एक दिन कहा भी था "जानती हो कुरुप घरवाली को ऐगो बहुत बड़ फ़ायदा है किसी का मन नही ललचाता |"
कह कर जोर से हसे थे लाल बाबू लेकिन सुरपा की आखों से आंसु तैर गये थे ||
…[ लाल बाबू ]…
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"वो जाना नही चाहती थी |" लेकिन जाना पडा था | क्यो कि मैने रोका नही | लेकिन कई हिंदी फ़िल्मो के द्र्श्य की तरह उसके इंतजार में मैं काफ़ी देर तक एअरपोर्ट के बाहर ही रुका रहा कि शायद जानबूझ कर फ्लाइट छोड़ दे और फ़िर से मेरे पास लौट आये | लेकिन ज़िंदगी कोई हिंदी फ़िल्म नहीं |
…[ फिरंगन की मोहब्बत ]…
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काश इस दुनिया मे ज़िंदगी के व्यापार होते तो इंसान उम्र के भी सौदे करता |
वैसे तो ज़िंदगी के सारे ही सच कड़वे ही होते हैं लेकिन कुछ सच इतने कड़वे होते हैं कि अपनी कड़वाहट से न केवल आपके समुचे अस्तिव को बल्कि आपकी समूची ज़िंदगी को विशैला कर देते हैं ||
…[ मौत की ओर ]…
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"हल्दी लगे, मडवा चढे
अम्मा का कलेजा फटे |"
अब अम्मा गुलाबी को क्या बताती कि जो सपना वह देख रही है वो तो कब का टूट गया है और उसकी किरचन ज़िंदगी भर गडेगी | अल्हड़ गुलाबी को कहाँ पता था की उसकी अम्मा उसके बियाह की खुशी से नही दुख से रो रही है |
एक तरफ बड़की रनिया है तो दूसरी तरफ छोटकी | एक का जीवन सवर रहा है तो दूसरी का बरबाद हो रहा है ! कैसे बतायें बिटिया को की अम्मा का कलेजा तलवार की धार पर है ||
…[ बाबा भोले नाथ की जय ]…
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अपने मन के विकार को भी शब्दो का मुखौटापहना दिया था | उन के लिये उनका नंगापन उत्सव था | उस महा पुरुष को उसके मन की विकृतिने एक साधारण सी स्त्री से समक्ष बौना बना दिया | घुटने टेक दिये हाथ जोड़ दिये | वो जादूई आखें गिरगिरा ऊठी | एक स्त्री के सब कुछ को उन्होने छुटटे पैसो की संज्ञा दी थी | ये उस महाज्ञानी की अज्ञानता नही तो और क्या थी ??
…[ दोगला ]…
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दूर से काँच के गिलास मे चाय गर्म खून , और जलती हूई सिगरेट चिता की लकडिया लग रही थी …||
…[ लवारिस लास ]…
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औरत का मन कच्ची मिट्टी सा होता है , जिस सांचे मे ढालो ढल जाता है | पूछने पर उसने कहा वो यायावर है, ज़िंदगी की खाक छानता यहाँ वहाँ भटकता रहता है | कुछ ढूँढ रहा है शायद, वो जो उससे बहुत पहले खो गया है | उसका अस्तिव दर्द मे डूबा हूआ है | एक ऐसा दर्द जिसे वो स्वयं भी नही पहचानता | उसे किसी खास किस्म की जडी बूटी की तलाश थी जो उस के दिल के दर्द की दवा बन सके | उस के अंदर दिन रात कुछ जल रहा है | एक ऐसी आग जिस ने उसकी आत्मा को शम्शान बना दिया | सुकुन की तलास ने उस के अंदर एक निराशा भर दी है ऐसी निराशा उस के अंदर के सृजनत्मक उर्जा को जला डाला | किसी की तलास है उसे , वो न्श्वर शरीर का लोलुप नही | उसे तो उस आत्मा की तलास थी जिस के साथ सम्भोग कर के वो अनंत मे विलीन हो जाय …||
…[ मृगमरीचिका ]…
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आप की सारी कहानिया बहुत अच्छी लगी.
[ Priyanka Om ]
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