शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

मैं

मैं बोलना चाहती हूँ
चूमना चाहती हूँ
पर अविश्वास की गहरी खाई
जो पनप रही है
मेरे और तुम्हारे दरमियान
हमें दो ध्रुवों की तरह मिलने नही देती
कभी सोचूँ भी कि दूँ आवाज
जो खाई से होकर सीधे तुम तक पहुँचें
पर नही
ये जाना चाहती है लगा कर पृथ्वी का चक्कर
चक्कर समाज का
जहाँ ये कुचली जायेगी
दुत्कारी जायेगी

इसलिए घोंट देती हूँ इसे यहीं
इस खाई में मुंह नीचा कर
कि प्रेम व्यवहार
कभी सराहा नही गया समाज में।

-निधि जैन की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=226828104315748&id=100009656793728

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