गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

मोहन थानवी की कलम से

अपने आस पास की ठंडी हवा से पूछा मैंने
वह
प्राणवायु देने वाले वृक्षों को क्यों छूना चाहती है ?
जवाब में वह मेरे कानों को ऐंठती हुई बोली
क्यों रे आदमी ; जानता नहीं तू ?
वृक्षों से तू ही नहीं मैं भी जीवन पाती हूं
वो मुझे पास पाकर झूमते हैं
और
तुझे देखकर भी गाते हैं
मगर
मैं हमेशा निहत्थी होती हूं
और तेरे पास कभी कभी तीखी कुल्हाड़ी होती है
ऐसा दृश्य देख कर ही मैं सिहर जाती हूं
और
ठंडी होने के बावजूद
अपने प्राणदाता से लिपट लिपट सिसकती-सिसकाती हूं।

- मोहन थानवी
की फेसबुक वाल से साभार

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1083706991660635&id=661237997240872

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