आँगन मे जलते हुए काठ के उपर
हाथों को सेंक लिया
बढ़ती ठंड और जमते कोहरे के बावजूद
दरवाज़े को खोल दिया
धीमी बारिश से गीली हुई मिट्टी पे खुद के ही पदचिह्न को देख
यूँ ही मुस्कुरा दिया,
अरसा हो गया था उनसे मिले हुए
उनके इंतेज़ार मे , एक बार फिर,
मुड़ के खुले हुए दरवाज़े को देख लिया ....
The curious wizard की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1697148993876058&id=1492080004382959
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें