शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

अल्हड़

बसंती दोहे
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नवल यौवना खेलतीं,अक्कड़-बक्कड़ खेल
बासंती आलोक में,.........जँचते सुंदर मेल ॥

कुसुम गलीचे पर उगी,नाजुक मनहर भोर
पवन झकोरे हृदय ले,छलकी सरिता कोर ॥

हरे-हरे हर पात पर, चमके शबनम बूँद
सागर में ले डुबकियाँ,दिनकर आँखें मूँद ॥

दिवा हुए थोड़े बड़े ,........रातें हुईं सकोच
बही समीरन मद भरी, उर्ध्मुखी ले सोच ॥

-कल्पना मनोरमा की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1858562061037142&id=100006500978091

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