मैं तारे इकट्ठे करती हूँ
कितनी कोशिश करते हो पीछा छुड़ाने की
फिर भी मैं परछाई सी तुम्हारे संग रहती हूँ
सूरज की धूप में तुम्हारे कदमों का साथ नहीं छोड़ती
और रात को तुम्हारा तकिया बनकर
मैं तारे इकट्ठे करती हूँ
रात में जब तुम उचक कर उठ बैठते हो
तुम्हारी आँख सबसे पहले मुझे ही देखती है
बालकनी में टहलते हुए
टेरस की कुर्सी पर बैठ कर जब तुम चाँद को देखते हो तब संग तुम्हारे
मैं तारे इकट्ठे करती हूँ
कोहरे की चादर ओढे सुनसान गलियों में जब
चौकीदार की सीटी बजती है और
सुनाई देती है बस उसकी चहलकदमी की आवाज़
तुम्हारे दिल की धड़कन भी मैं सुनती हूँ रात भर चांदनी के साए तले
मैं तारे इकट्ठे करती हूँ
मैं तो रूठती नहीं न ही तुम मनाते हो
अपनी ही धुन में रहते हो अजनबी से बनकर
जानते हो तुम मुझको पर मैं तुमको न जान पाई हूँ अबतक
सर्द रातों में ठिठुरती हथेलियों से आंसू पोंछकर
मैं तारे इकट्ठे करती हूँ
-तरसेम
- तरसेम की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=694868050616849&id=100002809826515
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