याद कितनी सरफिरी है।
घेर कर मुझको खड़ी है।
आसमां कुछ झुक गया है,
कुछ ज़मीं उठने लगी है।
भूलना आसां कहाँ है,
सांस वो है,वो जिंदगी है।
दर्द का दरमा बता दूं
बस जरा सी इक हँसी है
मिट गये होते निशां तक,
प्रेम से दुनिया बची है।
है सभी कुछ पास यूँ ,पर,
जिंदगी में कुछ कमी है।
जल गई इंसानियत तक,
आग ऐसी क्यूँ जली है।
लोग मुड़ मुड़ देखते सब,
बात उसमे कुछ नई है।
चाँद इतना क्यूँ धुला है,
रात इतनी क्यूँ सजी है।
दौड़ कर आई हवा क्यूँ,
पेड़ के सीने लगी है।
मांज लूँ आँखे जरा सी,
दीद की आई घड़ी है।
धूप में कोई खड़ा क्यूँ,
ओह वो छत पर खड़ी है।
नम हुआ मौसम यहाँ, या
आँख की आशा नमी है।
- आशा पाण्डेय ओझा की फेसबुक वाल से साभार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें