गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

समय

समय यथावत् ही रहा!
किंतु,
समय के सहारे
कब तक टिका जा सकता था?

चाहे मेरी स्थिरता पर
और ऊंचा होता गया हो आकाश...
और विस्तृत होता गया हो...

चाहे,
धुंधलाते ही गये हों तारे...
सूरज और ठंडा पडता गया हो...

-प्रिया साहू की फेसबुक वाल से साभार
- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=209231922760172&id=100010200963651

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