दूर कहीं
एक नदी बहती है
जिसके किनारे
राम भरत संग खेले
बहु धनुहीं तोरीं ।
दूर कहीं
एक नदी बहती है
जिसके पार
मृग स्वर्ण
छल अपार ।
दूर कहीं
एक नदी बहती है
समीप जिसके
धरती समाई सीता
राम ने ली जल समाधि ।
दूर कहीं
एक नदी बहती है
जिसके किनारे
कान्हा ने वंशी बजाई
जग को लुभाई ।
दूर कहीं
एक नदी
समुद्र में समाती है
कृष्ण समाधिस्थ होते हैं
शिकारी के शिकार में ।
आज भी
वह
" एक नदी बहती है "
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