शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

नदी आज भी बहती है

दूर कहीं
एक नदी बहती है
जिसके किनारे
राम भरत संग खेले
बहु धनुहीं तोरीं ।

दूर कहीं
एक नदी बहती है
जिसके पार
मृग स्वर्ण
छल अपार ।

दूर कहीं
एक नदी बहती है
समीप जिसके
धरती समाई सीता
राम ने ली जल समाधि ।

दूर कहीं
एक नदी बहती है
जिसके किनारे
कान्हा ने वंशी बजाई
जग को लुभाई ।
 
दूर कहीं
एक नदी
समुद्र में समाती है
कृष्ण समाधिस्थ होते हैं
शिकारी के शिकार में ।

आज भी
वह
" एक नदी बहती है "

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