गुरुवार, 27 अगस्त 2015

सुनती है माटी

बंजारे
आवारा
चक्षु उन्मीलित
जब खुलते हैं
मिट्टी आकार लेती है
शब्द खिलते हैं ।।

शब्द खिलते हैं
एक रूह में बदल
करते ग्रहण
आकार नया
बजती बांसुरी
बसती
इक दुनिया
नई
खुलते नये आयाम
चतुर्दिक ।।

सुनती है माटी
बोलते हैं शब्द ।।


An abstract digital art
- Anupam Gupta

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