शनिवार, 19 सितंबर 2015

तुमसे

अनुपम गुप्त#190920150841
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शब्द बोलते हैं
माटी सुनती है
पुरवा डोलती है

मन सोचता है
धड़कन सुनती है
चूड़ियों की खनक

वक्त कहता है
आज सुनता है
स्वयं को सम्बोधित राग

समय के तराजू में
कुछ छूटी
कुछ याद आईं
कुछ खट्टी
कुछ मीठी
कुछ कच्ची
कुछ पक्की
कुछ कहती
कुछ सुनती
यादें

तुम सब जानती हो
समय सब जानता है ।

An abstract oil painting
-Anupam Gupta

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