शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

दिल

दिलको अपने कभी ग़मगीन जो पाया मैंने
तेरी  यादों  के  घरोंदों  को  सजाया मैंने

यूँतो दिल में मेरे अरमान थे कितने लेकिन
ज़िन्दगी  तुझको  बड़ी देर से  पाया  मैंने

जबभी चाहा के तुझे भूलही जाऊं यकसर
ज़र्रे - ज़र्रे  में  तेरा  अक्स ही पाया मैंने

दिल के वीरान कदे में जले यादों के चराग़
आज यूं जशने - ग़मे - यार मनाया मैंने

मेरे जज़्बात, मेरे दिल पे थे भारी हर दम
वही क़िस्से जिन्हें हंस,हंस के सुनाया मैंने

दिल के वो टुकड़े तुम्हें कैसे दिखाऊं 'अंजुम'
बारहा जिनको सलीक़े से सजाया मैंने।।

- अंजुम की फेसबुक वाल  से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=939418246141640&id=100002204196089

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

मैं

मैं बोलना चाहती हूँ
चूमना चाहती हूँ
पर अविश्वास की गहरी खाई
जो पनप रही है
मेरे और तुम्हारे दरमियान
हमें दो ध्रुवों की तरह मिलने नही देती
कभी सोचूँ भी कि दूँ आवाज
जो खाई से होकर सीधे तुम तक पहुँचें
पर नही
ये जाना चाहती है लगा कर पृथ्वी का चक्कर
चक्कर समाज का
जहाँ ये कुचली जायेगी
दुत्कारी जायेगी

इसलिए घोंट देती हूँ इसे यहीं
इस खाई में मुंह नीचा कर
कि प्रेम व्यवहार
कभी सराहा नही गया समाज में।

-निधि जैन की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=226828104315748&id=100009656793728

सितारा

सितारा जो टूटा मेरे आस्मां का, सर्द रात को अंगीठी में धुआं होगा

चूल्हे की लकड़ियाँ गीली होंगी, खाली घड़ा और भरा खारा कुआं होगा

~ Rahi की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1084256484958042&id=1017227968327561

अल्हड़

बसंती दोहे
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नवल यौवना खेलतीं,अक्कड़-बक्कड़ खेल
बासंती आलोक में,.........जँचते सुंदर मेल ॥

कुसुम गलीचे पर उगी,नाजुक मनहर भोर
पवन झकोरे हृदय ले,छलकी सरिता कोर ॥

हरे-हरे हर पात पर, चमके शबनम बूँद
सागर में ले डुबकियाँ,दिनकर आँखें मूँद ॥

दिवा हुए थोड़े बड़े ,........रातें हुईं सकोच
बही समीरन मद भरी, उर्ध्मुखी ले सोच ॥

-कल्पना मनोरमा की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1858562061037142&id=100006500978091

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

समय

समय यथावत् ही रहा!
किंतु,
समय के सहारे
कब तक टिका जा सकता था?

चाहे मेरी स्थिरता पर
और ऊंचा होता गया हो आकाश...
और विस्तृत होता गया हो...

चाहे,
धुंधलाते ही गये हों तारे...
सूरज और ठंडा पडता गया हो...

-प्रिया साहू की फेसबुक वाल से साभार
- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=209231922760172&id=100010200963651

बसंत

Savan ke agman per ek kavita likhi thi sochti hun savan ke jane se pehle dal dun....
Lekin savan jata khan he pyar karne vale hirdye me savan hamesha rehta he......

आया वसन्त
खिले दिग दिगन्त
खुशियाँ अनंत
निसी दिन

मादक बयार
चले आर पार
बजे दिल का तार
धिन धिन

सरसों के फूल
ह्रदय के शूल
करवाएं भूल
पल छिन

मन की उमंग
उङे बन पतंग
कितनी तरंग
मत गिन

अमवा पे बौर
कोयल का शोर
कर दे  विभोर
हर दिन

मन है उदास
नहीं तुम हो पास
बुझे कैसे प्यास
तुम बिन...

बुशरा तबस्सुम की फेसबुक वाल से साभार
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=612825488817039&id=100002687816349

मुक्त

मैं मुक्ति की आकांक्षा की परिणति हूँ
बूँद भर आँखों में
सागर को उड़ेल देने का स्वप्न,
और गज भर आँचल में
वृहद समाज के लांछनों को ढोने पर भी
उसके छूट जाने का
या फट जाने का संदेह
मुझे विचलित नहीं करता,
न ही रोकता है
मेरे पैरों को
जो शांत श्वासों की थाप पर
नृत्य करते हैं बेसुध हो कर|

मैं मुक्ति की आकांक्षा की परिणति हूँ.....
दो मुट्ठियों में
धरती और आकाश को भींचकर
और नाज़ुक से कंधों पर
संस्कारों में लपेटी परतंत्रता को ढोने पर भी
थक जाने का
या टूट जाने का संदेह
मुझे विचलित नहीं करता
न ही रोकता है
मेरी बाहों को
जो प्रकृति को समेट लेती हैं
जब पैर थिरकते हैं श्वासों की थाप पर|

मैं मुक्ति की आकांक्षा की परिणति हूँ....
जीवन और मृत्य के बिम्बों पर
आनंद के सूक्ष्म कणों को टिकाकर
और आत्मा की मिट्टी पर
देह के ऊग आने पर भी
पलीत नहीं होती
ना ही पतित होती है
जहां सारे संदेहों को द्वार मिलता है
समाधान का,
जहां से सारे द्वार खुलते हैं
मुक्ति के......

-माँ जीवन शेफाली की फेसबुक वाल से साभार